Sunday, 31 July 2016

सवाल-मुस्लमान दीन की दो विरोधाभासी बातों को एक साथ क्यों नहीं एक्सेप्ट कर पाते?
जवाब:- विरोधाभासी बातें क़ुबूल करना इंसानी फितरत के खिलाफ है, इन्सान को कभी यह करना भी नहीं चाहिए. विरोधाभास का मतलब दोनों का सही होना नहीं होता बल्कि विरोधाभास का मतलब दोनों में से एक का सही होना होता है. कुरआन इसी लिए कहता है कि अगर यह कुरआन इंसानों का कलाम होता तो इसमें ज़रूर विरोधाभास होता. मालूम हुआ विरोधभास होना मतलब कुछ ख़राबी होना है.
दीन में विरोधभास नहीं सिर्फ समझने में गलती या समझने में फर्क हो सकता है. मसले का हल बस एक है कि हम सब एक दूसरे का दीन को समझने का हक़ तस्लीम कर लें जो सब को सब के रब ने दिया है. मगर क्या किया जाए वो हक़ हम एक दुसरे के पास बर्दाशत नहीं करते. क्या ही अच्छा हो अगर हम एक दूसरे को इख्तिलाफ का हक़ दें और जज़्बाती फतवों की बजाए दलील से बात करें, मुमकिन है एक साल तक भी एक मसले पर मैं आप की राए ना बदल सकूँ लेकिन जब तक मैं आप को अपनी राए रखने का हक़ दिए रहूँगा तब तक हम हज़ार इख्तिलाफ के बाद भी भाई बने रह सकते हैं.
किसी आलिम ने क्या खूब कहा है कि ''मैं समझता हूँ कि मेरी राए सही है और उसकी गलत है, लेकिन मुमकिन है कि उसकी राए सही हो और मेरी गलत''.

*बहुत से गैर-मुस्लिम मुसलमानों के फिक्ही इख्तेलाफ़ से पैदा हुए फिरकापरस्ती को वर्ण विभाजन का पर्याय के रूप में लेते हैं?
}} लेना ही चाहिए मुसलमानों का जो रवय्या आज कल वो देख रहे हैं खास कर हिन्द ओ पाक में उसका यह लाज़मी नतीजा है.

*सैयद, शेख पठान वगैरह-2 इसके मुताल्लिक यह साफ करें की क्या इसका ताल्लुक भी इस्लाम से है?
}} शायद ही कोई मुसलमान होगा जिसे यह ना पता हो कि हम सब इंसान आदम की औलाद हैं और आदम मिट्टी से पैदा हुए थे. शायद ही कोई मुसलमान होगा जिसने अल्लाह के रसूल (स) का आखरी खुतबा ना सुना हो जिसमे उन्होंने साफ अल्फाज़ में फरमा दिया था कि किसी अरबी को किसी गैर अरबी पर किसी काले को किसी गोरे पर कोई फज़ीलत नहीं, फज़ीलत अगर किसी की हो सकती है तो सिर्फ अल्लाह का डर दिल मे सबसे ज़्यादा रखने वाले को हो सकती है.
अपने आप को पैदाईशी तौर पर दूसरे से बड़ा समझना इब्लीस की सुन्नत है और सिवाए शैतान के कौन है जो इब्लीस की सुन्नत को अपने लिए पसंद करे ?
शुक्रिया

मेरा सवाल यह है की क्या फिरकों का ताल्लुक इस्लाम से है?///////
}} इस्लाम से फिरकों का ताल्लुक यह है कि जहाँ इस्लाम होगा वहां फिरकावारियत एक लम्हे नहीं रह सकती, भला आप ही मुझे बताएं जिस इस्लाम की किताब मैं ऐसी आयतें हों वहां कोई फि
रका कैसे रह सकता है ? (ना हो जाओ उन मुशरिकों की तरह जिन्होंने अपने दीन के टुकड़े टुकड़े कर दिए और खुद गिरोह गिरोह हो गए, फिर जिस गिरोह के पास जो कुछ है वो उसी में मगन है. सूरेह रूम आयत 31,32)
(जिन्होंने अपने दीन के टुकड़े टुकड़े कर दिए और खुद कई गिरोह हो गए आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का उनसे कोई ताल्लुक नहीं, उनका मामला अल्लाह ही के हवाले है फिर अल्लाह ही उन्हें बतलाएगा जो कुछ वो करते थे. सूरेह अनआम आयत 159) हर मुसलमान खुद सोचले कि क्या इस तरह कि आयातों के बाद भी फिरका परस्ती की कोई गुंजाइश कहीं बाकि है ?

*या फिर सब फिरके सिर्फ मैं ही सही हूँ की ज़िद मात्र हैं?
}} बिलकुल यही बात है, मसला यह नहीं होता कि एक चीज़ को आप एक तरह समझ रहे हैं और मैं दूसरी तरह.... मसला तब होता है जब मैं आप के ईमान के फैसले करने बैठ जाता हूँ. यह वो काम है जो सिर्फ खुदा कर सकता है लेकिन आज अकसर मुसलमान यह काम खुद कर रहे हैं और एक दुसरे को गुमराह और गुस्ताख के फतवे लगा रहे हैं, फिर जो काम खुदा के करने का है उसे जब इंसान करेंगे तो नतीजा अच्छा कैसे निकल सकता है, हम ने अल्लाह की रस्सी (कुरआन) को कभी का छोड़ दिया है और अलाने फलाने की रस्सी को पकड़ लिया है. कुरआन अगर हम पढ़ते तो क्या यह आयत पढ़ कर हमारे दिल कांप ना जाते (और ये लोग वहि के ज़र्ये हक़ का इल्म आजाने के बाद भी आपस में टुकड़े टुकड़े हुए सिर्फ अपनी ज़िद और हसद की वजह से, और अगर आप के रब की तरफ से मौहलत का एक वक़्त तए ना होता तो यकीनन उन लोगों के दरमियान फैसला कभी का चुका दिया गया होता. सूरेह शूरा आयत 14)

शक्ति विश्वास की

अक़ीदे की ताकत :
खुदा पर अकीदा (आस्था) इन्सान को इस दुनिया में सबसे बड़ा सहारा देता है। ख़ुदा पर अकीदा, विश्वास का सबसे बड़ा स्रोत है। यह दुनिया समस्याओं की दुनिया है। यहां हर औरत और मर्द को बार बार समस्यायें आती हैं। अक्सर ऐसी परिस्थितियां आती है कि जहां आदमी अपने आप को बेबस महसूस करने लगता है।
ज़िन्दगी के सफर में बार बार आदमी को एेसा महसूस होता है कि आगे का रास्ता बन्द है। बार बार इंसान इस तरह कि नकारात्मक भावनाओं से दो चार होता है कि उसके संसाधनों और सूत्रों की अंतिम सीमा आ गई , खुद अपने बल पर अब अपनी समस्या को हल करना नामुमकिन हो गया, आदि।
जिस आदमी का ख़ुदा में अक़ीदा न हो, वह एेसे मौके पर मायूसी का शिकार हो जाता है। वह आहत होकर बैठ जाता है। उसको महसूस होता है कि अब उसके अन्दर आगे बढ़ने की हिम्मत नही । एेसी हालत में पहुंच कर आदमी टेंशन में जीने लगता है, और टेंशन अपने आप में सारी बीमारीयों की जड़ है। हकीकत यह है कि टेंशन से ज़्यादा बड़ी कोई समस्या इन्सान के लिये नही।
लेकिन जिस आदमी को ख़ुदा के ऊपर सच्चा यक़ीन हो, वह कभी मायूसी का शिकार नही होता। उसको हर स्थिती में यह यकीन रहता है कि उसका ख़ुदा ज़रूर उसकी मदद करेगा ।
एेसा आदमी पूरे विश्वास के साथ यह समझता है कि उसका ख़ुदा ज़रूर उसकी डूबती हुई नाव को बचा लेगा, उसका ख़ुदा उस समय भी जरूर उसका साथ देगा जबकि दूसरे लोग उसका साथ छोड़ चुके हों ।
(उर्दू मैग्ज़ीन अलरिसाला : Nov. 2010) 
[ अनुवादक : फहीम मसूद किदवाई ]