सवाल-मुस्लमान दीन की दो विरोधाभासी बातों को एक साथ क्यों नहीं एक्सेप्ट कर पाते?
जवाब:- विरोधाभासी बातें क़ुबूल करना इंसानी फितरत के खिलाफ है, इन्सान को कभी यह करना भी नहीं चाहिए. विरोधाभास का मतलब दोनों का सही होना नहीं होता बल्कि विरोधाभास का मतलब दोनों में से एक का सही होना होता है. कुरआन इसी लिए कहता है कि अगर यह कुरआन इंसानों का कलाम होता तो इसमें ज़रूर विरोधाभास होता. मालूम हुआ विरोधभास होना मतलब कुछ ख़राबी होना है.
दीन में विरोधभास नहीं सिर्फ समझने में गलती या समझने में फर्क हो सकता है. मसले का हल बस एक है कि हम सब एक दूसरे का दीन को समझने का हक़ तस्लीम कर लें जो सब को सब के रब ने दिया है. मगर क्या किया जाए वो हक़ हम एक दुसरे के पास बर्दाशत नहीं करते. क्या ही अच्छा हो अगर हम एक दूसरे को इख्तिलाफ का हक़ दें और जज़्बाती फतवों की बजाए दलील से बात करें, मुमकिन है एक साल तक भी एक मसले पर मैं आप की राए ना बदल सकूँ लेकिन जब तक मैं आप को अपनी राए रखने का हक़ दिए रहूँगा तब तक हम हज़ार इख्तिलाफ के बाद भी भाई बने रह सकते हैं.
किसी आलिम ने क्या खूब कहा है कि ''मैं समझता हूँ कि मेरी राए सही है और उसकी गलत है, लेकिन मुमकिन है कि उसकी राए सही हो और मेरी गलत''.
*बहुत से गैर-मुस्लिम मुसलमानों के फिक्ही इख्तेलाफ़ से पैदा हुए फिरकापरस्ती को वर्ण विभाजन का पर्याय के रूप में लेते हैं?
}} लेना ही चाहिए मुसलमानों का जो रवय्या आज कल वो देख रहे हैं खास कर हिन्द ओ पाक में उसका यह लाज़मी नतीजा है.
*सैयद, शेख पठान वगैरह-2 इसके मुताल्लिक यह साफ करें की क्या इसका ताल्लुक भी इस्लाम से है?
}} शायद ही कोई मुसलमान होगा जिसे यह ना पता हो कि हम सब इंसान आदम की औलाद हैं और आदम मिट्टी से पैदा हुए थे. शायद ही कोई मुसलमान होगा जिसने अल्लाह के रसूल (स) का आखरी खुतबा ना सुना हो जिसमे उन्होंने साफ अल्फाज़ में फरमा दिया था कि किसी अरबी को किसी गैर अरबी पर किसी काले को किसी गोरे पर कोई फज़ीलत नहीं, फज़ीलत अगर किसी की हो सकती है तो सिर्फ अल्लाह का डर दिल मे सबसे ज़्यादा रखने वाले को हो सकती है.
अपने आप को पैदाईशी तौर पर दूसरे से बड़ा समझना इब्लीस की सुन्नत है और सिवाए शैतान के कौन है जो इब्लीस की सुन्नत को अपने लिए पसंद करे ?
शुक्रिया
जवाब:- विरोधाभासी बातें क़ुबूल करना इंसानी फितरत के खिलाफ है, इन्सान को कभी यह करना भी नहीं चाहिए. विरोधाभास का मतलब दोनों का सही होना नहीं होता बल्कि विरोधाभास का मतलब दोनों में से एक का सही होना होता है. कुरआन इसी लिए कहता है कि अगर यह कुरआन इंसानों का कलाम होता तो इसमें ज़रूर विरोधाभास होता. मालूम हुआ विरोधभास होना मतलब कुछ ख़राबी होना है.
दीन में विरोधभास नहीं सिर्फ समझने में गलती या समझने में फर्क हो सकता है. मसले का हल बस एक है कि हम सब एक दूसरे का दीन को समझने का हक़ तस्लीम कर लें जो सब को सब के रब ने दिया है. मगर क्या किया जाए वो हक़ हम एक दुसरे के पास बर्दाशत नहीं करते. क्या ही अच्छा हो अगर हम एक दूसरे को इख्तिलाफ का हक़ दें और जज़्बाती फतवों की बजाए दलील से बात करें, मुमकिन है एक साल तक भी एक मसले पर मैं आप की राए ना बदल सकूँ लेकिन जब तक मैं आप को अपनी राए रखने का हक़ दिए रहूँगा तब तक हम हज़ार इख्तिलाफ के बाद भी भाई बने रह सकते हैं.
किसी आलिम ने क्या खूब कहा है कि ''मैं समझता हूँ कि मेरी राए सही है और उसकी गलत है, लेकिन मुमकिन है कि उसकी राए सही हो और मेरी गलत''.
*बहुत से गैर-मुस्लिम मुसलमानों के फिक्ही इख्तेलाफ़ से पैदा हुए फिरकापरस्ती को वर्ण विभाजन का पर्याय के रूप में लेते हैं?
}} लेना ही चाहिए मुसलमानों का जो रवय्या आज कल वो देख रहे हैं खास कर हिन्द ओ पाक में उसका यह लाज़मी नतीजा है.
*सैयद, शेख पठान वगैरह-2 इसके मुताल्लिक यह साफ करें की क्या इसका ताल्लुक भी इस्लाम से है?
}} शायद ही कोई मुसलमान होगा जिसे यह ना पता हो कि हम सब इंसान आदम की औलाद हैं और आदम मिट्टी से पैदा हुए थे. शायद ही कोई मुसलमान होगा जिसने अल्लाह के रसूल (स) का आखरी खुतबा ना सुना हो जिसमे उन्होंने साफ अल्फाज़ में फरमा दिया था कि किसी अरबी को किसी गैर अरबी पर किसी काले को किसी गोरे पर कोई फज़ीलत नहीं, फज़ीलत अगर किसी की हो सकती है तो सिर्फ अल्लाह का डर दिल मे सबसे ज़्यादा रखने वाले को हो सकती है.
अपने आप को पैदाईशी तौर पर दूसरे से बड़ा समझना इब्लीस की सुन्नत है और सिवाए शैतान के कौन है जो इब्लीस की सुन्नत को अपने लिए पसंद करे ?
शुक्रिया

