Sunday, 31 July 2016

मेरा सवाल यह है की क्या फिरकों का ताल्लुक इस्लाम से है?///////
}} इस्लाम से फिरकों का ताल्लुक यह है कि जहाँ इस्लाम होगा वहां फिरकावारियत एक लम्हे नहीं रह सकती, भला आप ही मुझे बताएं जिस इस्लाम की किताब मैं ऐसी आयतें हों वहां कोई फि
रका कैसे रह सकता है ? (ना हो जाओ उन मुशरिकों की तरह जिन्होंने अपने दीन के टुकड़े टुकड़े कर दिए और खुद गिरोह गिरोह हो गए, फिर जिस गिरोह के पास जो कुछ है वो उसी में मगन है. सूरेह रूम आयत 31,32)
(जिन्होंने अपने दीन के टुकड़े टुकड़े कर दिए और खुद कई गिरोह हो गए आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का उनसे कोई ताल्लुक नहीं, उनका मामला अल्लाह ही के हवाले है फिर अल्लाह ही उन्हें बतलाएगा जो कुछ वो करते थे. सूरेह अनआम आयत 159) हर मुसलमान खुद सोचले कि क्या इस तरह कि आयातों के बाद भी फिरका परस्ती की कोई गुंजाइश कहीं बाकि है ?

*या फिर सब फिरके सिर्फ मैं ही सही हूँ की ज़िद मात्र हैं?
}} बिलकुल यही बात है, मसला यह नहीं होता कि एक चीज़ को आप एक तरह समझ रहे हैं और मैं दूसरी तरह.... मसला तब होता है जब मैं आप के ईमान के फैसले करने बैठ जाता हूँ. यह वो काम है जो सिर्फ खुदा कर सकता है लेकिन आज अकसर मुसलमान यह काम खुद कर रहे हैं और एक दुसरे को गुमराह और गुस्ताख के फतवे लगा रहे हैं, फिर जो काम खुदा के करने का है उसे जब इंसान करेंगे तो नतीजा अच्छा कैसे निकल सकता है, हम ने अल्लाह की रस्सी (कुरआन) को कभी का छोड़ दिया है और अलाने फलाने की रस्सी को पकड़ लिया है. कुरआन अगर हम पढ़ते तो क्या यह आयत पढ़ कर हमारे दिल कांप ना जाते (और ये लोग वहि के ज़र्ये हक़ का इल्म आजाने के बाद भी आपस में टुकड़े टुकड़े हुए सिर्फ अपनी ज़िद और हसद की वजह से, और अगर आप के रब की तरफ से मौहलत का एक वक़्त तए ना होता तो यकीनन उन लोगों के दरमियान फैसला कभी का चुका दिया गया होता. सूरेह शूरा आयत 14)

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